स्नेह और आशीर्वाद के साथ

03 जुलाई 2009

अपने जन्मदिन पर हम बड़े हैरान

आज आपको हम अपने जन्मदिन की बात सुनाते हैं। हमारा जन्मदिन 5 मई को पड़ता है। घर में सभी की बहुत इच्छा थी कि इसे विस्तृत रूप से मनाया जाये। चाचा और पिताजी के एक परिचित मित्र हैं जो एक गेस्ट हाउस के संचालक हैं, उनके गेस्ट हाउस को बुक करने की बात भी हो गई।
घर में इस तरह का पहला कार्यक्रम किया जाना था तो सोचा गया कि सभी को बुलाया जाये। बाबा-दादी, बुआ-फूफा, नाना-नानी, मामा-मामी, चाचा तथा और भी बहुत सारे लोगों को बुलाया जाना तय हुआ। गर्मी के मारे हाल भी बुरा था पर जन्मदिन मनाया जाना था और सभी को आना भी था।
इधर घर में कुछ कारणों से चाची घर से बाहर नहीं जा सकतीं थीं। इस कारण हमारे पिताजी का मन नहीं था कि इस तरह से बड़ा कार्यक्रम किया जाये और घर का ही कोई सदस्य उसमें शामिल न हो पाये। बहुत विचार-मंथन के बाद यह तय किया गया कि किसी को भी न बुलाया जाये और आसपास के बच्चों को ही बुला कर एक बच्चा पार्टी कर दी जाये।
कुल मिला कर सब तैयारी होने लगी। वह दिन भी आ गया। चाचा सामान लाने और उनको सजाने में ही लगे रहे। पिताजी के एक बहुत ही घरेलू दोस्त बबलू चाचा हमारे लिए केक बनवाने गये। उन्होंने और पिताजी ने इतना बड़ा केक बनवाया कि जब शाम को बबलू चाचा केक लाने गये तो वह आसानी से उठ नहीं रहा था। इस डर से कि कहीं केक रास्ते में टूट न जाये बबलू चाचा ने उसका आधार अपने कम्प्यूटर के ढक्कन से बना दिया।
घर में सभी तैयारी हो गईं थीं। हमारे मोहल्ले के बच्चों को और आसपास के घरों के कुछ खास लोगों को ही बुलाया गया। सबने मिल कर खूब धमाचैकड़ी की। हम ठहरे बहुत ही छोटे तो हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है? हमारे चाचा ने हमें अपनी गोद में लेकर हमसे केक कटवाया, मोमबत्ती भी जलवाई। हम तो बस सभी को देख-देख कर खुश हो रहे थे। कभी हम अपनी मम्मा की गोद में रहते, कभी चाची की गोद में, कभी हमें चाचा ले लेते तो कभी मोहल्ले की छोटी-छोटी दीदियाँ हमें ले लेतीं।
हम तो बस इधर-उधर हैरत से देख रहे थे और यही सोच कर प्रसन्न थे कि आज सभी लोग हमारे आसपास घूम रहे हैं।
मजा तो अब अगले जन्म दिन पर आयेगा जब हम समझदार हो जायेंगे और मस्ती में सभी के साथ झूमेंगे।

1 टिप्पणी:

परा वाणी - अरविंद पाण्डेय ने कहा…

सुन्‍दर। शुभकामनाएँ।