स्नेह और आशीर्वाद के साथ

06 नवंबर 2009

देख लो कितना काम करते हैं हम

हम हो गए हैं अब बड़े,
इसलिए काम भी करते हैं बड़े-बड़े।
आप ही देख लो, हम अपना बिस्तर ख़ुद ही बिछाते हैं। वैसे घर में हम बहुत से काम अपने हाथ से ही करते हैं। खाना भी अपने हाथ से खाते हैं ये बात और है कि कई बार इस चक्कर में मम्मा से डांट पड़ जाती है।

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04 नवंबर 2009

मौके का उठाया फायदा - झूला झूल कर

इस महीने की पहली तारीख को हमारी छोटी बहिन अपने नाना के घर चली गई तो अकेले में हमें बहुत ही खराब लग रहा है। घर में हम एकदम अकेले हो गये हैं। वैसे सारा दिन हम उसी के साथ खेला-कूदा करते थे।
वैसे वह अभी बहुत ही छोटी है, इस कारण हमारे साथ भागदौड़ तो कर नहीं पाती है पर लेटे-लेटे ही साथ में खेल लिया करती थी।
एक बात इस दौरान मजेदार भी हुई। हमें अपने छोटे में झूले में लेटने की बात तो याद है नहीं और न ही ये पता है कि झूले में लेटने का क्या मजा है। अब जबकि हमारी छोटी बहिन घर पर नहीं है तो हमने मौका देखकर झूले में लेटने का आनन्द उठा लिया।
वैसे हमारे लिए दूसरा झूला आँगन में टाँग दिया गया है। दिन में जब भी हमें मौका मिलता है उसी में झूल लेते हैं।


03 नवंबर 2009

हम निकले आज घूमने के लिए

आज बहुत दिनों बाद आप लोगों से बातचीत हो रही है। इधर हम मुम्बई से आने के बाद घर के कामों में ज्यादा व्यस्त हो गये थे।
आज हम अपने मम्मा और पिताजी के साथ घूमने गये। पहले हम गये पिताजी के बहुत ही अच्छे दोस्त डा0 दुर्गेश कुमार जी के घर। वहाँ मिली दीदी और देवांश भैया से मुलाकात हुई।

बाएँ से हम, देवांश भइया, मिली दीदी

उनके साथ हम खूब खेले, बड़ा मजा आया।
बाद में दीदी और भैया हमारे लिए अपने सारे खिलौने निकाल लाये। मजा तो तब आया जब उन्होंने हमें खिलौनों के बीच बैठाकर हमें भी खिलौनों में शामिल कर दिया।
वहाँ से आने के बाद हम अपनी बुआ के घर भी गये। हमारी दीदी तो बाहर गईं थीं सो हमारे साथ खेलने वाला कोई नहीं था। बुआ के घर थोड़ी ही देर रुके और बापस दादी के पास आ गये।
घूमने में पर आया तो मजा।