
किताब आये बहुत दिन हो गये थे। हमने उसमें कुछ चित्रों को पहचानना भी शुरू कर दिया था। कुत्ता, गाय, कबूतर, फूल को तो हम बड़ी अच्छी तरह से पहचान लेते हैं। इसका एक कारण हमारी गली में रोज ही कुत्ता, गाय, चिड़िया आते-जाते रहते हैं।
किताब में बनी छोटी लड़की को हम दीदी के द्वारा पहचान पाते हैं। और तो और अब हम आइसक्रीम को भी पहचानने लगे हैं। पहले हमने आइसक्रीम देखी नहीं थी इस कारण हम उसे पहचान नहीं पाते थे। इस बार गर्मियों की छुट्टी में हम अपने नाना के घर इलाहाबाद गये। वहाँ हमारे मामा ने हमको आइसक्रीम खिलाई, सच में बड़ा मजा आया। तब से हम आइसक्रीम पहचानने लगे हैं।

बात हो रही थी पढ़ने की। दो-तीन दिन पहले हमारी किताब हमें फिर मिल गई। तबसे इसे हम अपने संग लिए घूम रहे हैं। सब लोग कहते हैं कि हमें भी पढ़ने की आदत रहेगी। हमारे बाबा को भी कुछ न कुछ पढ़ते रहने की आदत थी। उनका तो आज भी एक बक्सा है जो साहित्यिक उपन्यासों से भरा हुआ है। हमारे पिजाती के बाबाजी भी सारा दिन कुछ न कुछ पढ़ते रहते थे। (हालांकि इन दोनों लोगों को हमने तो देखा नहीं है।) हमारे पिताजी भी बहुत पढ़ते हैं, सारा दिन कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं। हमारे पिताजी के पास भी बहुत किताबें हैं। सेल्फ में सजी किताबें देख कर हमारा मन बहुत ललचाता है।
हम भी सोचते हैं सजा लो आप कुछ दिन और। जब हम थोड़ा बड़े हो जायेंगे तो निकाल कर पढ़ लिया करेंगे।
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